Dussehra 2019: पीएम मोदी ने किया 107 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन

​नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बार दिल्ली के द्वारका में रावण दहन कार्यक्रम में शामिल हुए. पीएम मोदी ने यहां पर 107 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया. पीएम के साथ दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी और पश्चिमी दिल्ली के सांसद प्रवेश वर्मा भी मौजूद थे.

द्वारका सेक्टर 10 की इस रामलीला में 107 फुट का रावण बनाया गया था. पीएम मोदी तीर चलाकर रावण का दहन किया. यहां के एंट्री गेट्स को इंडिया गेट की तर्ज पर बनाया गया था. हर साल करीब 70 हजार लोग इस ग्राउंड में रावण दहन देखने आते हैं.

आयोजनकर्ताओं ने बताया कि वे पिछले चार सालों से द्वारका सेक्टर 10 की रामलीला में आने के लिए पीएम मोदी से निवेदन कर रहे थे. इस कार्यक्रम को लोग दूर से भी देख सकें, इसके लिए कई जगहों पर एलईडी स्क्रीन लगाई गई थी. पीएम मोदी की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम किए गए थे. जिस मंच से पीएम को रावण दहन के लिए तीर चलाना था, वह एसपीजी की कड़ी सुरक्षा में था.

रावण दहन से पहले पीएम मोदी ने यहां मौजूद लोगों को संबोधित किया.अपने भाषण की शुरुआत उन्होंने जय श्रीराम से की. उन्होंने कहा कि शायद ही 365 दिन में कोई एक दिन हो,जब भारत में कोई उत्सव ना मनाया जाता हो. उत्सव हमें जोड़ते हैं और उमंग भरते हैं. पीएम मोदी ने कहा कि विजयादशमी के मौके पर हमें अपने भीतर के असुर पर विजय प्राप्त करनी चाहिए.

उन्होंने कहा, आज वायु सेना दिवस है और वायु सेना हमें भगवान हनुमान की याद दिलाती है. इस मौके पर हमें देश की वायु सेना और उसके वीर जवानों को भी याद करना चाहिए. आज विजय का पर्व है और हमें अपने भीतर की असुरी शक्तियों पर भी विजय पानी चाहिए.

मोदी ने कहा कि हम महात्मा गांधी की 150वीं जयंती का साल मना रहे हैं. इस मौके पर सभी देशवासी संकल्प करें कि देश की भलाई का काम करेंगे. मोदी ने यहां मौजूद लोगों से पानी बचाने, खाना झूठा नहीं छोड़ने, बिजली बचाने और देश की संपत्ति को नुकसान नहीं होने देने जैसे कुछ संकल्प भी करवाए. इसके साथ ही उन्होंने सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने का संकल्प लेने की भी बात कही.

पीएम मोदी ने कहा कि भारत उत्सवों की भूमि है. हमारे देश के उत्सवों ने संस्कार, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन सिखाने का काम किया है. भारत के सामाजिक जीवन का प्राण तत्व उत्सव ही हैं, क्लब कल्चर नहीं.

मोदी ने कहा कि इसी उत्सवधर्मिता के चलते हमारे देश में रोबोट नहीं, बल्कि महसूस करने वाले मनुष्य पैदा होते हैं. जब भी हमारे समाज में कोई बुराई आई तो समाज के भीतर से ही उसके खिलाफ आवाज उठने लगती है. भारतीय समाज बदलाव को लगातार स्वीकार करता रहा है.

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